Mukhwak Ang 680, Date 10-06-2026

   AMRIT VELE DA 

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ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥

 ਜਤਨ ਕਰੈ ਮਾਨੁਖ ਡਹਕਾਵੈ ਓਹੁ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਜਾਨੈ ॥ ਪਾਪ ਕਰੇ ਕਰਿ ਮੂਕਰਿ ਪਾਵੈ ਭੇਖ ਕਰੈ ਨਿਰਬਾਨੈ ॥੧॥

 ਜਾਨਤ ਦੂਰਿ ਤੁਮਹਿ ਪ੍ਰਭ ਨੇਰਿ ॥ ਉਤ ਤਾਕੈ ਉਤ ਤੇ ਉਤ ਪੇਖੈ ਆਵੈ ਲੋਭੀ ਫੇਰਿ ॥ ਰਹਾਉ ॥ 

ਜਬ ਲਗੁ ਤੁਟੈ ਨਾਹੀ ਮਨ ਭਰਮਾ ਤਬ ਲਗੁ ਮੁਕਤੁ ਨ ਕੋਈ ॥ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਸੰਤੁ ਭਗਤੁ ਜਨੁ ਸੋਈ ॥੨॥੫॥੩੬॥

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धनासरी महला ५ ॥ 

जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥ पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥१॥

 जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥ उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥

 जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥ कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥२॥५॥३६॥

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Eng. Meaning:

DHANAASAREE, FIFTH MEHL: People try to deceive others, but the Inner-knower, the Searcher of hearts, knows everything. They commit sins, and then deny them, while they pretend to be in Nirvaanaa. ||1|| 

They believe that You are far away, but You, O God, are near at hand. Looking around, this way and that, the greedy people come and go. || Pause|| 

As long as the doubts of the mind are not removed, liberation is not found. Says Nanak, he alone is a Saint, a devotee, and a humble servant of the Lord, to whom the Lord and Master is merciful. ||2||5||36||

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ਅਰਥ: 

ਹੇ ਭਾਈ! (ਲਾਲਚੀ ਮਨੁੱਖ) ਅਨੇਕਾਂ ਜਤਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਧੋਖਾ ਦੇਂਦਾ ਹੈ, ਵਿਰਕਤਾਂ ਵਾਲੇ ਧਾਰਮਿਕ ਪਹਿਰਾਵੇ ਬਣਾਈ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, ਪਾਪ ਕਰ ਕੇ (ਫਿਰ ਉਹਨਾਂ ਪਾਪਾਂ ਤੋਂ) ਮੁੱਕਰ ਭੀ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਸਭ ਦੇ ਦਿਲ ਦੀ ਜਾਣਨ ਵਾਲਾ ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ (ਸਭ ਕੁਝ) ਜਾਣਦਾ ਹੈ।੧। 

ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਤੂੰ (ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੇ) ਨੇੜੇ ਵੱਸਦਾ ਹੈਂ, ਪਰ (ਲਾਲਚੀ ਪਖੰਡੀ ਮਨੁੱਖ) ਤੈਨੂੰ ਦੂਰ (ਵੱਸਦਾ) ਸਮਝਦਾ ਹੈ। ਲਾਲਚੀ ਮਨੁੱਖ (ਲਾਲਚ ਦੇ) ਗੇੜ ਵਿਚ ਫਸਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, (ਮਾਇਆ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ) ਉੱਧਰ ਤੱਕਦਾ ਹੈ, ਉੱਧਰ ਤੋਂ ਉੱਧਰ ਤੱਕਦਾ ਹੈ (ਉਸ ਦਾ ਮਨ ਟਿਕਦਾ ਨਹੀਂ)।ਰਹਾਉ। 

ਹੇ ਭਾਈ! ਜਦੋਂ ਤਕ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਮਨ ਦੀ (ਮਾਇਆ ਵਾਲੀ) ਭਟਕਣਾ ਦੂਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਇਹ (ਲਾਲਚ ਦੇ ਪੰਜੇ ਤੋਂ) ਆਜ਼ਾਦ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਆਖ-(ਪਹਿਰਾਵਿਆਂ ਨਾਲ ਭਗਤ ਨਹੀਂ ਬਣ ਜਾਈਦਾ) ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਉਤੇ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਦਇਆਵਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ (ਤੇ, ਉਸ ਨੂੰ ਨਾਮ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇਂਦਾ ਹੈ) ਉਹੀ ਮਨੁੱਖ ਸੰਤ ਹੈ ਭਗਤ ਹੈ।੨।੫।੩੬।

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अर्थ:

हे भाई! (लालची मनुख) अनको जातां करता है, लोगो को धोखा देता है, झूठे धार्मिक पहरावे बनाई रखता है, पाप करके (फिर उनसे मुकर जाता है) परन्तु सब के दिलों की जानने वाला प्रभु (सब कुछ) जनता है।१। 

हे प्रभु! तुम(सब जीवों के) नजदीक बसते हो, परन्तु (लालची पाखंडी मनुख) तुझे दूर (बस्ता) समझता है। लालची मनुख (लालच के चक्कर ) में फसा रहता है, (माया की खातिर) इधर उधर देखता है, उधर से उधर देखता है (उसका मन टिकता नहीं) ।रहाउ। 

हे भाई! जब तक मनुष्य के मन की (माया वाली) भटकना दूर नहीं होती, इस (लालच के पँजे से) आजाद नहीं हो सकता। हे नानक! कह– (पहरावों से भगत नहीं बन जाते) जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू खुद दयावान होता है (और, उसको नाम की दाति देता है) वही मनुष्य संत है भगत है।2।5।36।

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