माता-पिता और गुरु का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की उन्नति का मार्ग है....
माता-पिता और गुरु का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की उन्नति का मार्ग है....
आज की भागती-दौड़ती दुनिया में हम तकनीक और तरक्की की सीढ़ियाँ तो चढ़ रहे हैं, लेकिन कहीं न कहीं अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं आधुनिक समाज का एक कड़वा सच है।
बच्चों में माता-पिता की सलाह को 'हस्तक्षेप' और उनके अनुभव को 'पुराना' समझने की प्रवृत्ति खतरनाक रूप से बढ़ रही है।
अनुभव का कोई विकल्प नहीं है गूगल के पास जानकारी हो सकती है, लेकिन माता-पिता के पास वह 'विवेक' है जो केवल जीवन की धूप में तपकर आता है।
हम कितनी भी बड़ी कुर्सी पर बैठ जाएं, लेकिन माता-पिता और गुरु के सामने हमारा कद सदैव छोटा ही रहना चाहिए। यही विनम्रता हमें महान बनाती है।
यह सच्चाई है कि हमारे किये संस्कारों का ही हस्तांतरण होता जो व्यवहार हम आज अपने माता-पिता के साथ करेंगे, वही संस्कार हमारी आने वाली पीढ़ी हमसे सीखेगी।
कभी कभी सफलता से बच्चों में यह अहंकार भी बढ़ने लगता है या अपनी सोच को ऊंचा समझकर देखते हैं कि वह अपने माता-पिता से ज्यादा समझदार है। उसके वृद्ध पिता जब भी उसे जीवन का कोई अनुभव साझा करते या सही रास्ता दिखाते, तो झिझक कर कहते हैं "पिताजी, अब ज़माना बदल गया है, आपकी पुरानी बातें आज के दौर में काम नहीं आतीं।"
धीरे-धीरे बच्चें अपने माता-पिता की सलाह मानना और उनसे बात करना तक बंद कर देते हैं । माता-पिता को केवल 'पिछड़ी सोच' वाला समझने लग जाते हैं । ऐसी हालत में जब घर में परेशानियां बढ़ने लगती हैं या कार्यों में सफलता नहीं मिलती तब इधर उधर भटकते हैं और तब कोई इनको कोई कहता है कि आप के उपर पितर दोष है, हो सकता उसका कहना सही हो । क्योंकि "शास्त्रों में कहा गया है कि पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही परम तप है। माता प्रत्यक्ष देवता है। गुरु तुम्हें अक्षर ज्ञान देता है, लेकिन माता-पिता तुम्हें जीवन का आधार देते हैं। तुमने अपनी जड़ों (माता-पिता) को ही काटना शुरू कर दिया, तो सफलता का वृक्ष हरा-भरा कैसे रह सकता है?"
सभी शास्त्र कहते है, पिता गुरु तुल्य होता है और पिता ही प्रथम गुरु होता है। जब तुम उनके अनुभवों का तिरस्कार करते हो, तो तुम केवल उनका नहीं, बल्कि उस ज्ञान का अपमान करते हो जो उन्होंने संघर्षों से सीखा है। उनकी इज्जत केवल इसलिए मत करो कि वे बड़े हैं, बल्कि इसलिए करो क्योंकि उनके आशीर्वाद में वह शक्ति है जो दुनिया की कोई डिग्री नहीं दे सकती।"
माता-पिता और गुरु का सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की उन्नति का मार्ग है। नई पीढ़ी के पास तकनीक हो सकती है, लेकिन बुजुर्गों के पास वह अनुभव है जो ठोकर खाने से बचाता है। शास्त्रों में माता-पिता को 'प्रथम गुरु' का दर्जा दिया गया है। यदि गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, तो माता-पिता उस प्रकाश को देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं।
गुरु और पिता में कोई भेद नहीं है; दोनों का उद्देश्य केवल और केवल संतान का कल्याण होता है। समाज के निर्माण में परिवार पहली इकाई माता-पिता है। यदि हम अपने घर के 'जीवंत देवताओं' (माता-पिता) का सम्मान नहीं कर सकते, तो मंदिर और गुरुद्वारों की इबादत मात्र एक दिखावा है।
माता-पिता के चरणों और उनके कड़वे लेकिन सच्चे वचन भी होते है। माता - पिता के आशीर्वाद की शक्ति का कोई अंत नहीं होता जिस घर में बड़ों का सम्मान होता है, वहां सुख-समृद्धि स्वयं निवास करती है।
गुरुवाणी भी हमें अपने माता पिता और गुरुजनों का आदर सत्कार करने की प्रेरणा देती है।
अगर हम गुरुवाणी पड़ते हैं और उस पर आचरण नहीं करते तो गुरुवाणी पड़ने से भी क्या फायदा?
जब डाक्टर से दवाई ले आये और सेवन नहीं करेगें तब तक कोई फायदा नहीं होता। "माता-पिता ही प्रथम गुरु और मार्गदर्शक हैं" ।
जी. एस. लबाना
इसे जरुर देखें 👇
https://youtube.com/shorts/3DTeK4oZbtU?si=RUrnMFehu-3oeeTd
/=/=/=/_=////==
🙏🙏
लबाना जागृति सन्देश यूट्यूब चैनल देखने के लिये नीचे किल्क करें 👇
https://youtube.com/@labanajagrtisandeshajmer228?si=DV8ougFj9LacvAKN
टी.वी. में यूट्यूब पर LABANA JAGRATI SANDESH चैनल को सर्च कर देख सकते हैं।
नोट: चैनल को लाइक ff सबक्राइब नहीं किया है तो अवश्य कर लें... 🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🙏🙏
स्वजातीय लबाना सिख समाज के रिश्ते नाते जानने के लिये नीचे क्लिक कीजिए
https://www.dailymaruprahar.page/2024/05/blog-post_27.html
सम्पादक का पता :
प्लाट नम्बर 2, पत्रकार कालोनी कोटडा,
अजमेर (राजस्था)
सम्पर्क : ई-मेल:
मो./वाट्सअप/फोन-पे: 9414007822
अर्जेन्ट : मो. - 9587670300 🙏
अधिक समाचार पढ़ने के लिए 👇
किल्क करें 👇
https://www.dailymaruprahar.page/?m
अपने विचार नीचे कमेंट्स बाक्स में दें ।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आदरणीयजी धन्यवाद 🙏