HUKAMNAMA SRI DARBAR SAHIB, AMRITSAR ANG 626, Date 21-1-2026

  AMRIT VELE DA 

HUKAMNAMA 

SRI DARBAR SAHIB,

 AMRITSAR 

 ANG 626, 

 Date 21-1-2026

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ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥ 

ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥ ਜਿਨਿਪੂਰਨ ਪੈਜ ਸਵਾਰੀ ॥ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ॥ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਸਦਾ ਧਿਆਇਆ ॥੧॥ 

ਸੰਤਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥ ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥

 ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਵਰ ਦੀਨੇ ॥ ਸਗਲ ਜੀਅ ਵਸਿ ਕੀਨੇ ॥ ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥ ਤਾ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਮਿਟਾਇਆ ॥੨॥੫॥੬੯॥

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ਅਰਥ:

ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋ! ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਗੁਰੂ ਤੋਂ ਕੁਰਬਾਨ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ,ਜਿਸ ਨੇ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇ ਕੇ) ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ(ਮੇਰੀ) ਇੱਜ਼ਤ ਰੱਖ ਲਈ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਮਨ-ਮੰਗੀਆਂ ਮੁਰਾਦਾਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ,ਜੇਹੜਾ ਸਦਾਆਪਣੇ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਧਿਆਨ ਧਰਦਾ ਹੈ ॥੧॥ 

ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋ!ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾ (ਜੀਵਾਂ ਦਾ) ਕੋਈ ਹੋਰ (ਰਾਖਾ)ਨਹੀਂ। ਉਹੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਜਗਤ ਦਾ ਮੂਲ ਹੈ ॥ ਰਹਾਉ॥

ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋ! ਪਿਆਰੇ ਪ੍ਰਭੂ ਨੇ (ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ) ਸਭ ਬਖ਼ਸ਼ਸ਼ਾਂਕੀਤੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਹਨ, ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੇਵੱਸ ਵਿਚ ਕਰ ਰੱਖਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਹੇ ਦਾਸ ਨਾਨਕ! (ਆਖ ਕਿ ਜਦੋਂ ਭੀ ਕਿਸੇ ਨੇ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮਸਿਮਰਿਆ, ਤਦੋਂ ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸਾਰੇ ਦੁੱਖ ਦੂਰ ਕਰ ਲਏ॥੨॥੫॥੬੯॥

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सोरठि महला ५ ॥

 गुर अपुने बलिहारी ॥ जिनिपूरन पैज सवारी ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ ॥ प्रभु अपुना सदा धिआइआ ॥१॥

 संतहु तिसु बिनुअवरु न कोई ॥ करण कारण प्रभु सोई ॥ रहाउ ॥

 प्रभि अपनै वर दीने ॥ सगल जीअ वसि कीने ॥ जन नानक नामु धिआइआ ॥ ता सगले दूख मिटाइआ ॥२॥५॥६९॥

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अर्थ:

हे संत जनों! मैं अपने गुरु से कुर्बान जाता हूँ, जिसने (प्रभु के नाम की दात दे के) पूरी तरह (मेरीइज्ज़त रख ली है। हे भाई! वह मनुख मन-चाही मुराद प्राप्त कर लेता है, जो मनुख सदा अपने प्रभु का ध्यान करता है॥१॥ 

हे संत जनों! उस परमात्मा के बिना (जीवों का) कोई और (रखवाला)नहीं। वोही परमात्मा जगत का मूल है॥रहाउ॥ 

हेसंत जनों! प्यारे प्रभु ने (जीवों को) सभी बखशिशेंकी हुई हैं, सरे जीवों को उस ने अपने बस में कररखा है। हे दास नानक! (कह की जब भी किसी ने) परमात्मा का नाम सुमिरा, तभी उस ने अपने सारेदुःख दूर कर लिए॥।२॥५॥६९॥

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Meaning:

Sorat’h, Fifth Mehl: 

I am a sacrifice to my Guru. He has totally preserved my honor. I have obtained the fruits of my mind’s desires. I meditate forever on my God. ||1||

 O Saints, without Him, there is no other at all. He is God, the Cause of causes. ||Pause|| 

My God has given me His Blessing. He has made all creatures subject to me. Servant Nanak meditates on the Naam, the Name of the Lord, and all his sorrows depart. ||2||5||69||

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